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معاوية بن أبي سفيان صخر بن حرب

English Mu‘āwiyah ibn Abi Sufyān Sakhr ibn Harb
اردو معاویہ بن ابی سفیان صخر بن حرب
বাংলা ভাষা মু‘আবিয়াহ ইবন আবী সুফিয়ান সখর ইবন হারব
हिन्दी मुआविया बिन अबू सुफ़यान सख़्र बिन हर्ब
తెలుగు ముఆవియా బిన్ అబూ సుఫ్యాన్ సఖర్ బిన్ హర్బ్

معاوية بن أبي سفيان -رضي الله عنهما-

English Mu‘āwiyah ibn Abi Sufyān (may Allah be pleased with him and his father)
اردو معاویہ بن ابی سفیان -رضی اللہ عنہما-
বাংলা ভাষা মু‘আবিয়াহ ইবন আবী সুফিয়ান রাদিয়াল্লাহু আনহুমা
हिन्दी मुआविया बिन अबू सुफ़यान -रज़ियल्लाहु अन्हुमा-
తెలుగు ముఆవియా బిన్ అబూ సుఫ్యాన్ రజియల్లాహు అన్హుమా.

أبو عبد الرحمن معاوية بن أبي سفيان صخر بن حرب بن أمية القرشي الأموي، صحابي جليل، أمير المؤمنين، قيل: إنه أسلم قبل أبيه وقت عمرة القضاء، وبقي يخاف من اللحاق بالنبي -صلى الله عليه وسلم- من أبيه، ولكن ما ظهر إسلامه إلا يوم الفتح، وكان أحد كتّاب الوحي، ولما استُخلف أبو بكر الصدّيق ولاه قيادة جيش تحت إمرة أخيه يزيد بن أبي سفيان، فكان على مقدمته في فتح مدينة صيداء وعرقة وجبيل وبيروت، ولما استُخلف عمر بن الخطاب جعله واليا على الأردن، ثم ولاه دمشق بعد موت أميرها يزيد أخيه، ثم ولّاه عثمان بن عفان الديار الشامية كلها وجعل ولاة أمصارها تابعين له، وبعد حادثة مقتل عثمان أصبح علي بن أبي طالب الخليفة فنشب خلاف بينه وبين معاوية حول التصرف الواجب عمله بعد مقتل الخليفة عثمان إلى أن اغتال ابن ملجم الخارجي عليًا فتولى ابنه الحسن بن علي الخلافة ثم تنازل عنها لمعاوية عام 41 وفق عهد بينهما، وقد زاغ فيه طرفان: طرف غلا في حبه والانتصار له، وطرف غلا في بغضه وكرهه والتحذير منه، بل وصل إلى الحكم عليه بالكفر والنفاق، قال ابن حزم: (فبويع الحسن، ثم سلَّم الأمر إلى معاوية، وفي بقايا الصحابة من هو أفضل منهما بلا خلاف، ممن أنفق قبل الفتح وقاتل، فكلهم أولهم عن آخرهم، بايع معاوية، ورأى إمامته، وهذا إجماع متيقن، بعد إجماعٍ على جواز إمامة مَن غيره أفضل، بيقين لا شك فيه)، توفي عام 60.

English He is Abu ‘Abdur-Rahmān Mu‘āwiyah ibn Abi Sufyān Sakhr ibn Harb ibn Umayyah al-Qurashi al-Umawi. He was an honorable Companion and the Commander of the Believers. It was said that he embraced Islam before his father at the time of Al-Qadā’ (compensation) ‘Umrah. He was afraid of his father and; thus, did not follow the Prophet (may Allah's peace and blessings be upon him) or reveal his Islam except on the day of the Conquest of Makkah. He was one of the scribes of the revelation. When Abu Bakr as-Siddīq became the caliph, he appointed him as leader of an army under the leadership of his brother Yazīd ibn Abi Sufyān, and he led the front army in conquering the cities of Sidon, Araqah, Byblos, and Beirut. When ‘Umar ibn al-Khattāb became the caliph, he appointed him as the ruler of Jordan, then as the ruler of Damascus, after the death of its ruler who was his brother Yazīd. Later, ‘Uthmān ibn ‘Affān entrusted him with all the cities of the Levant and made its rulers under his leadership. After the killing of ‘Uthmān, ‘Ali ibn Abi Tālib became the caliph and he disagreed with Mu‘āwiyah regarding what should be done after the killing of ‘Uthmān. The conflict continued until Ibn Muljam al-Khāriji assassinated ‘Ali, then, his son, Al-Hasan, succeeded him. However, he waived the caliphate to Mu‘āwiyah, as per an agreement between them, in 41 AH. Two groups of people adopted extreme attitudes regarding ‘Ali: one group exaggerated in loving and supporting him, and the other group exaggerated in hating and warning against him to the extent of accusing him of disbelief and hypocrisy. Ibn Hazm said: "Al-Hasan was given the pledge of allegiance, then he handed it over to Mu‘āwiyah, although there were still among the Companions those who were definitely better than both of them from those who spent and fought before the Conquest. However, all of them pledged allegiance to Mu‘āwiyah and agreed on his leadership. This is a certain unanimity after the unanimous agreement on the permissibility of the leadership of one, even if there are others better than him." He died in 60 AH.
اردو امیر المؤمنین ابو عبدالرحمن معاویہ بن ابو سفیان صخر بن حرب بن امیہ قرشی اموی ایک بڑے صحابی ہیں، کہا جاتا ہے کہ انھوں نے عمرۃ القضا کے وقت ہی اپنے والد سے پہلے اسلام قبول کر لیا تھا، لیکن اپنے والد کے ڈر سے اللہ کے نبی کے پاس آ نہيں سکے۔ انھوں نے اپنے مسلمان ہونے کا اظہار فتح مکہ کے دن کیا، وہ وحی لکھنے کا کام کرنے والے لوگوں میں شامل تھے، جب ابو بکر صدیق خلیفہ ہوئے تو ان کو ان کے بھائی یزید بن ابوسفیان کی امارت میں ایک لشکر کی قیادت سونپی، چنانچہ صیدا، عرقہ، جبیل اور بیروت جیسے شہر انہی کی سربراہی میں فتح ہوئے۔ جب عمر بن خطاب -رضی اللہ عنہ- خلیفہ ہوئے تو ان کو اردن کا امیر بنا دیا، بعد میں یزید ابو سفیان کے انتقال کے بعد ان کو دمشق کا امیر بنا دیا، بعد ازاں عثمان بن عفان -رضی اللہ عنہ- نے ان کو پورے علاقۂ شام کا گورنر بنا دیا اور مختلف علاقوں کے امیروں کو ان کے ماتحت کر دیا، ‏عثمان بن عفان -رضی اللہ عنہ- کے قتل کے بعد جب علی -رضی اللہ عنہ- خلیفہ بنے تو ان کے اور معاویہ کے درمیان اس بات میں اختلافات ابھر کر سامنے آئے کہ تیسرے خلیفہ عثمان بن عفان کے قتل کے بعد کس طرح کے اقدامات کرنے ضروری ہيں، اختلافات کافی آگے بڑھ گئے، یہاں تک ابن ملجم خارجی نے علی -رضی اللہ عنہ- کا قتل کر دیا اور ان کے بیٹے حسن نے خلافت سنبھالی، لیکن سنہ 41ھ میں حسن بن علی، ان کے اور معاوجہ کے درمیان ہونے والے ایک قرار کے مطابق حسن خلافت سے دست بردار ہوکر اسے معاویہ کے حوالے کر دیا، علی -رضی اللہ عنہ- کے بارے میں دو قسم کے لوگ گمراہ ہوئے ہيں، کچھ لوگوں نے ان سے بغض رکھنے، نفرت کرنے اور ان سے لوگوں کو دور کرنے میں غلو سے کام لیا ہے، حد یہ ہے کہ ان پر کفر و نفاق کا حکم بھی لگایا ہے، ابن حزم کہتے ہیں : "اس کے بعد حسن سے بیعت کی گئی اور پھر انھوں نے خلافت معاویہ کے حوالے کر دی، جب کہ بچے ہوئے صحابہ میں کئی لوگ ایسے تھے، جو بلا اختلاف دونوں سے اچھے تھے، ان میں سے کچھ لوگوں نے فتح مکہ سے پہلے اللہ کی راہ میں مال خرچ کیا تھا اور جنگ کی تھی، اس کے باوجود شروع سے آخر تک سب نے معاویہ کے ہاتھ پر بیعت کر لی اور ان کی امامت کو درست مان لیا، دراصل یہ ایک یقینی اجماع ہے، اس اجماع کے بعد کہ افضل کے رہتے ہوئے مفضول کی امامت صحیح ہے، یہ ایک یقینی بات ہے، اس میں کسی قسم کے کسی شک و شبہ کی گنجائش نہيں ہے۔" سنہ 60ھ میں وفات پائی۔
বাংলা ভাষা আবূ আব্দুর রহমান মু‘আবিয়াহ ইবন আবী সুফিয়ান সখর ইবন হারব ইবন উমাইয়্যাহ আল-কুরাইশী আল-উমাভী। তিনি একজন সম্মানিত সাহাবী ছিলেন। আমীরুল মু’মিনীন। বলা হয়, তিনি উমরাতুল কাযার সময়ে, তার পিতার আগে ইসলাম গ্রহণ করেন। তবে তিনি তার পিতার কারণে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে মিলিত হতে ভয় পেতেন। তবে তিনি মক্কা বিজয়ের পরে তিনি তার ইসলামের কথা প্রকাশ করেন। তিনি একজন কাতিবে অহী (অহী লেখক) ছিলেন। যখন আবূ বাকর আস-সিদ্দীক খিলাফাতে আসলেন, তখন তিনি তাকে তার ভাই ইয়াযিদ ইবন আবী সুফিয়ানের অধীনে সেনাধ্যক্ষ নিযুক্ত করেন। তিনি জুবাইল, ইরক্বাহ ও বৈরুত বিজয়ে সম্মুখসারীতে ছিলেন। এরপরে যখন উমার খিলাফাতে আসলেন, তখন তিনি তাকে প্রথমে জর্ডানে এবং পরবর্তীতে দামেশকের আমীর ও তার ভাই ইয়াযিদ মারা যাওয়ার পরে তাকে দামেশকে গভর্নর হিসেবে প্রেরণ করেন। এরপরে উসমান ইবন আফফান তাকে সমগ্র সিরিয়ার ব্যাপারে দায়িত্ব প্রদান করেন এবং সিরিয়ার অন্যান্য শহরের আমীরদেরকে তার অধিনস্ত হিসেবে আদেশ জারী করেন। এরপরে উসমানের হত্যাকাণ্ডের পরে, আলী ইবন আবী তালেব খলীফা হন এবং উসমান হত্যার পরবর্তী আবশ্যক পদক্ষেপের ব্যাপারে তার মধ্যে ও মু‘আবিয়ার মধ্যে দ্বন্দের সূত্রপাত হয়। এটা চলতেই থাকে, যতক্ষণ না খারেজী ইবন মুলজিম আলীকে হত্যা করে ফেলে। তারপরে আলীর পুত্র হাসান খলীফা নিযুক্ত হন। এরপরে তিনি ৪১ হিজরীতে তাদের মধ্যকার একটি চুক্তির ভিত্তিতে মু‘আবিয়াকে ক্ষমতা হস্তান্তর করে খিলাফাত থেকে নিজেকে সরিয়ে নেন। এরপরে দুটি দল এখান থেকে বিচ্যুত হয়ে যায়, একটি দল মু‘আবিয়ার ভালোবাসা ও তাকে সমর্থন করার ক্ষেত্রে বাড়াবাড়িতে লিপ্ত হয়ে পড়ে, আর অপরদিকে আরেক দল তাকে ঘৃণা-অপছন্দ করা ও তার থেকে সতর্ক করার দিক থেকে বাড়াবাড়িতে লিপ্ত হয়ে যায়। এমনকি তারা মু‘আবিয়াকে কুফর ও নিফাকের হুকুম আরোপ করতে থাকে। ইবনু হাযম বলেন: “এরপরে হাসানের বাই‘আত সম্পন্ন হয়, এরপরে তিনি মু‘আবিয়ার কাছে দায়িত্ব হস্তান্তর করেন। আর সে সময় অনেক সাহাবী এমন ছিলেন, যারা সর্বসম্মতিক্রমে তাদের উভয়ের থেকে উত্তম ছিলেন, যাদের মধ্যে মক্কা বিজয়ের আগে যারা দান করেছেন এবং যুদ্ধ করেছেন, তারাও ছিলেন। তাদের প্রত্যেকেই শুরু থেকে শেষ পর্যন্ত মু‘আবিয়ার কাছে বাই‘আত নেন। তার নেতৃত্বের উপরে ইজমা করেন। তারপূর্বে এই ইজমা হয় যে, সবচেয়ে যোগ্য ব্যক্তির বর্তমানে অপেক্ষাকৃত কম যোগ্য ব্যক্তির ইমাম হওয়া বৈধ। এটা এমন নিশ্চিত ইজমা, যাতে কোনো সন্দেহ নেই।” তিনি ৬০ হিজরীতে মৃত্যুবরণ করেন।
हिन्दी अबू अब्दुर रहमान मुआविया बिन अबू सुफ़यान सख़्र बिन हर्ब बिन उमय्या क़ुरशी अउमवी एक बड़े सहाबी हैं, जो अमीर अल-मोमिनीन भी रहे। कुछ लोगों का कहना है कि वह अपने पिता से पहले छूटे हुए उमरे की अदायगी के समय मुसलमान हो गए थे, लेकिन अपने पिता के भय से अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से नहीं मिले। उनके इस्लाम का इज़हार मक्का विजय के दिन ही हुआ। वह वह्य लिखने वाले लोगों में से एक थे। जब अबू बक्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- ख़लीफ़ा बने, तो उनके भाई यज़ीद बिन अबू सुफ़यान की गवरनरी काल में सेना के एक भाग की अगुवाई उनके हवाले कर दी। उनकी अगुवाई ही में सैदा, इरक़ा, जुबैल तथा बैरूत आदि नगर पर विजय प्राप्त हुई। जब उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ख़लीफ़ा बने, तो उनको उरदुन का गवरनर बना दिया। फिर उनके भाई यज़ीद की मृत्यु के बाद उनको दमिश्क़ का गवरनर बना दिया। उसमान -रज़ियल्लाहु अन्हु- का दौर आया, तो उनको पूरे शाम क्षेत्र का गवरनर बना दिया और उस क्षेत्र के विभिन्न नगरों के अमीरों को उनके अधीन बना दिया। उसमान -रज़ियल्लाहु अन्हु- की हत्या के बाद अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ख़लीफ़ा बने, तो दोनों के बीच इस मसले में मतभेद हो गया कि उसमान -रज़ियल्लाहु अन्हु- की हत्या के बाद क्या किया जाना चाहिए। मतभेद का यह सिलसिला जारी रहा, यहाँ तक कि इब्न-ए-मुलजिम ख़ारिजी ने अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- की भी हत्या कर दी। अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- के बाद उनके बेटे हसन -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने ख़िलाफ़त की बागडोर संभाली, लेकिन 41 हिजरी में उनके तथा मुआविया के बीच होने वाले एक करार के अनुसार खिलाफ़त मुआविया -रज़ियल्लाहु अन्हु- के हवाले कर खुद उससे अलग हो गए। मुआविया के बारे में दो प्रकार के लोग पथभ्रष्टता के शिकार हुए हैं। कुछ लोगों ने उनके प्रेम तथा तरफ़दारी में अतिशयोक्ति की है, और कुछ लोगों ने उनसे दुश्मनी तथा नफ़रत में अतिशयोक्ति की है और उनको मुनाफ़िक़ तथा काफ़िर तक कह दिया है। इब्ने हज़्म कहते हैं : "फिर हसन के हाथ पर बैअत की गई। लेकिन बाद में उन्होंने ख़िलाफ़त मुआविया के हवाले कर दी, जबकि इस बात में किसी का कोई मतभेद नहीं है कि शेष सहाबा में ऐसे लोग मौजूद थे, जो उन दोनों से श्रेष्ट थे, जिन्होंने मक्का विजय से पहले अपना धन खर्च किया था और युद्ध किया था। इन सारे लोगों ने, शुरू से अंत तक, मुआविया के हाथ पर बैअत कर ली और उनकी ख़िलाफ़त को स्वीकार कर लिया। निःसंदेह यह इजमा (मतैक्य) है। जबकि एक इजमा और भी है कि अधिक श्रेष्ठ की उपस्थिति में कम श्रेष्ठ को ख़लीफ़ा बनाया जा सकता है।" सन् 60 हिजरी में मृत्यु को प्राप्त हुए।
తెలుగు అబూఅబ్దుర్రహ్మాన్ ముఆవియా బిన్ అబూసుఫ్యాన్ సఖర్ బిన్ హర్బ్ బిన్ ఉమయ్య ఖుర్షీ ఉమవి ఒక గొప్ప సహాబి. ఇతను అమీరుల్ 'మూమినీన్. అతను తన తండ్రి కంటే ముందే ఉమ్రతుల్ ఖజా రోజున ఇస్లాం స్వీకరించారు కానీ అతని తండ్రి భయంతో అల్లాహ్ ప్రవక్త సల్లల్లాహు అలైహి వసల్లంను కలవలేదు'అని కొందరుపండితులు తెలిపారు. మక్కా విజయం రోజున అతను తన ఇస్లాంను వ్యక్తీకరించారు. దైవవాణి లేఖఖుల్లో ఆయన కూడా ఒకరు. అబూబకర్ రజియల్లాహు అన్హు ఖలీఫా అయినప్పుడు తన సోదరుడు యజీద్ బిన్ అబూసుఫ్యాన్ గవర్నర్'గా ఉన్న హయాంలో సైన్యంలో కొంత భాగానికి నాయకత్వం వహించారు. అతని నాయకత్వంలో, సైదా, ఇర్కా, జుబైల్ మరియు బైరూత్ వంటి నగరాలు జయించబడ్డాయి. ఉమర్ బిన్ ఖత్తాబ్ రజియల్లాహు అన్హు ఖలీఫా అయినప్పుడు అతను ఉర్దూన్ గవర్నర్గా నియమించబడ్డారు. అతని సోదరుడు యజీద్ మరణం తరువాత అతను దిమిష్ఖ్'కు గవర్నర్గా నియమించబడ్డారు. ఉస్మాన్ రజియల్లాహు అన్హు సమయం వచ్చినప్పుడు ఆయన అతనిని షామ్ మొత్తానికి ఆ ప్రాంతానికి గవర్నర్గా చేసారు మరియు ఆ ప్రాంతంలోని వివిధ నగరాల్లోని నేతలను అతని క్రింద నియమించారు. ఉస్మాన్ హత్య తరువాత రజియల్లాహు అన్హు అలీ బిన్ అబూ తాలిబ్ రజియల్లాహు అన్హు ఖలీఫా అయ్యారు. అప్పుడు అలీ రజియల్లాహు అన్హుకు మరియు ముఆవియా రజియల్లాహు అన్హుకు మధ్యలో ఉస్మాన్ రజియల్లాహు అన్హు హత్య తరువాత ఏమి చేయాలనే దానిపై ఇద్దరి మధ్య అభిప్రాయ భేదాలు వచ్చాయి. అవి ఇబ్నుముల్జిమ్ ఖారిజీ- అలీ రజియల్లాహు అన్హును షహీదు చేసేవరకు కొనసాగాయి. అలీ రజియల్లాహు అన్హు తరువాత అతని కుమారుడు హసన్ రజియల్లాహు అన్హు ఖలీఫా పగ్గాలు చేపట్టారు, అయితే 41వ హిజ్రీలో అతనికి మరియు ముఆవియాకు మధ్య జరిగిన ఒప్పందం ప్రకారం ఖిలాఫతును ముఆవియాకు అప్పగించి స్వయంగా ఖిలాఫతు నుండి తప్పుకున్నారు. ముఆవియా రజియల్లాహు అన్హు గురించి ప్రజలు రెండు రకాలుగా చీలిపోయారు. కొంతమంది ఆయన పట్ల ప్రేమ మరియు అభిమానంలో అతిశయోక్తికి గురయ్యారు, మరియు కొంతమంది ఆయన పట్ల శత్రుత్వం మరియు ద్వేషంలో అతిశయిల్లారు మరియు అతన్ని మునాఫిఖ్ మరియు కాఫిర్ అని కూడా పిలిచారు. ఇబ్నుహజ్మ్ ఇలా అన్నారు: "అప్పుడు హసన్ చేతిపై బైఅత్ జరిగింది. కానీ తరువాత అతను ముఆవియాకు ఖిలాఫతును అప్పగించారు, అప్పటికీ మిగిలిన సహాబాలలో వారిద్దరి కంటే ఉన్నతమైన వ్యక్తులు శ్రేష్టులు ఉన్నారు,మక్కా విజయానికి ముందు తమ సంపదను ఖర్చు చేసి పోరాడారు,అందులో మొదటి నుండి చివరి వరకు ప్రతీ ఒక్కరూ ముఆవియా చేతిలో బయత్ తీసుకొని అతని ఖిలాఫతును అంగీకరించారు. ఇది బలమైన ఇజ్మా (ఏకగ్రీవం).అయితే ఇక్కడ ఖిలాఫతు సర్వశ్రేష్టులు ఉనికి ఉన్నప్పటికి తక్కువస్థాయి వారికి ఖిలాఫతు ఇవ్వబడటం సమంజసమే.అని కూడా ఇజ్మా ఉంది" ఆయన హిజ్రీ 60వ సంవత్సరంలో మరణించారు.

معجم الصحابة لابن قانع (3/72) أسد الغابة (5/201) تاريخ دمشق (59/55) الأعلام للزركلي (7/261)